नई दिल्ली:
बिहार में लागू शराबबंदी कानून पर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट सख्त हो गया है। राज्य सरकार की लापरवाही पर नाराजगी जताते हुए शीर्ष अदालत ने सवाल उठाया कि जब विशेष अदालतों का बुनियादी ढांचा ही तैयार नहीं हुआ, तो शराबबंदी के तहत गिरफ्तार सभी आरोपितों को जमानत पर क्यों न छोड़ दिया जाए?
8 साल बाद भी कोर्ट के लिए जमीन तक आवंटित नहीं — SC खफा
जस्टिस संजय किशन कौल की अगुवाई वाली पीठ ने कहा—
“2016 में बिहार मद्यनिषेध और उत्पाद अधिनियम बनाया गया था, लेकिन आज तक विशेष अदालतों के गठन के लिए जमीन का आवंटन तक नहीं किया गया। आखिर सरकार कर क्या रही है?”
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि जब तक कोर्ट नहीं बन जाते, तब तक क्या सरकार चाहती है कि लाखों मामले यूं ही पड़े रहें?
पीठ ने सीधे-सीधे सवाल किया—
👉 “जब तक इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं होता, तब तक सभी को जमानत पर क्यों न रिहा कर दें?”
👉 “सरकारी भवन खाली क्यों नहीं कराते? वहीं क्यों नहीं अदालतें शुरू कर देते?”
3.78 लाख मामले लंबित, निपटाए सिर्फ 4,000 — बोझ से टूटी न्यायपालिका
सुप्रीम कोर्ट ने आंकड़े पेश किए—
- शराबबंदी कानून के तहत 3.78 लाख से ज्यादा केस दर्ज,
- लेकिन निपटारे हुए केवल 4,000 से कुछ अधिक।
अदालत ने कहा—
“आप कानून तो बना देते हैं, मगर न्यायिक ढांचा और समाज पर उसके असर के बारे में सोचना जरूरी नहीं समझते?”
कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सजा की शक्ति पर भी सवाल
शराब पीने पर जुर्माने वाले प्रावधान को लेकर अदालत ने कहा कि यह ठीक है, लेकिन कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सजा देने की शक्ति देने पर पटना हाईकोर्ट पहले ही आपत्ति जता चुका है।
एमिकस क्यूरी गौरव अग्रवाल ने भी यह बात दोहराई।
बिहार सरकार को मिला एक हफ्ते का समय
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से कहा कि
- इस पूरे मामले पर स्पष्ट निर्देश लेकर आएं,
- बताएं कि विशेष अदालतों के गठन, जमीन आवंटन और लंबित मामलों के निपटारे के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा सकते हैं।
अदालत ने इस पर एक सप्ताह का समय दिया है।
